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उसे सब दुनियां पसंद थी

हम भी और उसे ये सब दुनियां पसंद थी
मैं सादा था बहुत उसे रंगीनियां पसंद थी

मैं हमेशा दूर भागता रहता फ़रेबों से
और उसे बहुत नज़दीकीयां पसंद थी

मैं पुराने “काफ़िर” को ही संजोता रहा
और उसे इसमें तबदिलीयां पसंद थी

उसकी चाह रिश्ते के धागे को मिटाना था
और मुझे वही सब निशानियां पसंद थी

ये जो सीतम ढ़ाए जा रहे थे ख़ुदग़र्ज़ लोग
उन्हें फ़क़त “काफ़िर” की बर्बादीयां पसंद थी

सर्वाधिकार सुरक्षित ®

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

एक और अधूरी मोहब्बत

” वो मुझे बहाने से फिर मिलने बुलाई
फिर मुझसे-प्यार करने का हक़ जताई ”

मना किया मैंने उसे कि, ‘ ये सब ग़लत है ‘
वो बोली ‘ मुझे ऐसे तड़पाने में तुझे का मिलत है?’

वो बोली
” देख प्यार करने दे तुझे वरना,
अपनी मोहब्बत के सामने निलाम हो जाऊंगी,
तेरे कारण हे प्रियतम मैं बदनाम हो जाऊंगी ”

मैं बोला ” देख, ये सब बातें अच्छी नहीं,
छोड़ दे सारे ज़िद्द कि अब तु बच्ची नहीं ”

क्रोध में इस बार उसने बोला
” देख, करने दे प्यार नहीं
तुझे बदनाम कर दूंगी,
कर रहा था ज़बरदस्ती
ये सरे आम कर दूंगी ”

मैं मन ही में मुस्काया और सोचा
” ये पगली क्रोध में अभी जल रही है,
अपने प्रेम को पाने के लिए क्या क्या कर रही है ”

फिर मैं बोला शांत स्वर में,
कुछ नहीं होगा लगाने से दशमलव सिफ़र में

और फिर बोला
” बदनामी से कौन डरता है साब
ये है कि थोड़ा और नाम हो जाएगा,
मेरी अपनी कहानी तो थी एक,अब
ये किस्सा भी सरे आम हो जाएगा ”

अब हुआ उसे एहसास अपनी ग़लती का
आंखें नम किए वो मुझसे बोली
” मार दे मुझे यहीं,जो अपने प्यार के लिए ऐसा बोला,
नहीं जीना अब कि अपने प्यार को मैंने ऐसा तोला ”

मैं बोला
” कौनो बात ना एतना सब होला*
तुमने तो सिर्फ क्रोध में ऐसा बोला ”

” जान क्या वो क़रीब आकर
ढ़ूढ़ंती रही मेरी निग़ाहों में ”
और बोली
” बस यही बात,यही बात
पसंद है मुझे जहानों में ”

वो बोली
” फिर करने दे ना प्यार
मुझे, भर के अपने पाशों में ”

मैं बोला
” फ़जूल ना कर वक़्त अपना
ऐसी बहकी आसों में ”

वो बोली
” दूआ करूंगी महबूब मेरे तू
हर बार मुझे ही, अरूब मिले ”

मैं बोला
” दूआ करूंगा, मैं मिलूं उसे
औ’ मुझे वही महबूब मिले ”

वो बोली
” करके ऐसी बातें क्यों ?
दर्द मेरा बढ़ाता है ,
दिवानी हूं तेरी- जाने जहां,
एक तुझीको दिख नहीं पाता है !”

“इस बार मूड़ी वह और जाने लगी,
दया उसपे मुझे बहुत आने लगी ”

” मैंने पकड़ कलाई रोका उसको,
आंखों से बह आई मोहब्बत को,
रूख़सारों पर से पोछा उसको ”

” फिर,माथा चूमा आंखें चूमी गाल चूमा
चूमा लरज़ते-लब और छोड़ दिया ”
” वो पगली बाहों में मेरे ऐसे गिरी
जैसे आज ही उसने दम तोड़ दिया ”

” मैंने भी उसको रोका नहीं रोने से
और बाहों में जकड़ा रहा,
जब तक बह ना गये उसके आंसू,
जब तक वह मज़बूत ना हुई,
उसको आगोश में अपने पकड़ा रहा ”

” अलग हटकर आलिंगनों से
मेरी आंखों में देखा,
देख रही थी शायद बावरी
अपने प्रेम की कोई रेखा ”

कुछ क्षण रूकी, और बोली
” अब तो ये बतलाओ तुमने, तुमको
एक बार भी प्यार क्यों नहीं करने दिया ?
फिर बाहों में तेरे चाहे, क्यों ना मरने दिया ?”

मैं बोला
” तुम अपने बच्चों को ये राज़ गर्व से बता सको,
कितना पवित्र तन तुम्हारा,कि
सौहर से अपने आंख से आंख मिला सको ”

” इस बार भी उसकी हुई आंख नम,
जैसे निकाल रही हो सारे ग़म ”
इस बार उसने मेरी पकड़ कलाई
” लबों पे अपने अधरों को रख दिया,
छोड़ दिया उसने जब, प्रेम रसों को सोख लिया ”

” फिर मैं चला आया कमरे से बाहर,
वो ताकती रही नैनन में लिए प्रेम गाहर ”

” एक और मोहब्बत रही अधुरी”– ये
सोच, चश्में- नम औ’ गला भर आई,
झटक इन ख़्यालों को ” काफ़िर”, पून:
करा चलाने दुनियां में रुसवाई ” ||

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

तुम्हें, याद है ना !

क्या तुम्हें याद है ? जब तुमने कहा था कि
“अब तुम्हारी बाहें जकड़ने लगी है मुझे”
और मैंने खोल दी थी अपनी बाहें हमेशा के लिए.!
अब… फिर, जब की तुम्हें किसी के बाहों में
सूकूं ना मिले, चली आना…
मेरी बाहें आज भी उसी तरह खुली मिलेंगी
तुम्हें फिर से जकड़ने के लिए ||
…. बोलो ! आओगी ना !

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

हां मैं देहाती हूं

हां मैं देहाती हूं ।
क्या इसलिए, गंवार हूं ?
तो हां, हूं मैं गंवार ।
तुम रखो शहर की
भाग दौड़, और मैं
रख लेता हूं,
गांव का सुकुं ||

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

क्या तुम दुबारा नहीं आओगी !

क्या तुमने टटोला है मेरा नब्ज़,
दुबारा आ कर…अपने जाने के बाद ?
कि कैसे आज भी तुम्हारी यादें,
धड़कने बढ़ा देती हैं… जैसे,
तुम्हारे आने पर बढ़ा करती थी |

तुम तो चली गई मुझे अकेला छोड़ कर
और ये भी देखो कि तुम थी तो,
किसी और को सोचने की, समझने की
फ़ुर्सत नहीं थी… और अब भी तुम्हारी जगह,
तुम्हारी यादों ने ले रखा है, या यूं कहें कि
तुम्हारी यादों के अलावा..
किसी की याद,
ख़्वाबों में भी नहीं आता |

हां मुझे पता है, तुम अब नहीं आओगी…
और ये भी पता है कि तुम मुझसे
इतना दूर जा चुकी हो कि, वहां से..
लौट आना, संभव सा नहीं, फिर भी !
क्या तुम मुझसे मिलने,
दुबारा नहीं आओगी?

इस बात पे तो आ जाओ? कि
तुम अब मेरा हाथ,
थाम कर चलना – भीड़ में भी ।
और जब तुम थक जाओ चलते- चलते,
अपने सर को चूम लेने देना – मेरे कांधे को,
इस बात पे डांटूगा नहीं तुम्हें कि,
” ठीक से चलो ” |

क्या तुम्हें याद है ?
एक बार तुमने थक कर रख दिया था
अपना सर, मेरे कांधे पर….
तुम्हारे मांथे से बह आए पसीने और,
आंखो का हल्का काजल, लग गया था
मेरी कमीज़ पर…
जिसके लिए डांट दिया था तुम्हें…
डांट सुन तुम्हारी आंखों में, पानी आ गये थे
जिससे, तुम्हें ज्यादा ना छूने वाला लड़का,
सरे- बाज़ार अपने सीने से लगा लिया था…
तुमने भी कैसे, अपनी बाहें मुझसे जकड़ लिया,
और अपनी आंखों के पानी को,
ढ़ीला छोड़ दिया था… और
हमारी पहली आलिंगन का निशान,
छोड़ दिया था तुमने, मेरी कमीज़ पर |

तुम्हें ये पता है कि, वो कमीज़ आज भी
वैसे ही रखी है, बिन धुले ?
जब भी तुम्हारी यादें, अपनी हदें भूलकर
मेरी धड़कनें, बेकाबू करने लगती हैं तो,
पहन लेता हूं, वही कमीज़…
और फिर ऐसा लगता है कि, तुम
समेटने लगी हो मुझे अपनी बाहों में,
तुम्हारी खुशबू समाने लगती हैं
मेरी रूह में, और ये धड़कने..धीरे-धीरे
सामान्य होने लगती हैं |

मुझे अब भी पता है, तुम
इतने पर भी दुबारा नहीं आओगी…
फिर भी, तुम्हें ये बताना चाहता हूं कि,
मेरा पसंदीदा ग़ज़ल, आज भी वही है
जो मेरे सामने बैठा करती थी, वो लड़की…
परंतु इतना ज़रूर है कि अब,
तुम्हारी पसंद की ग़ज़लें, सुना करते हैं |

और हर शाम, चले आते हैं…
हमारे मनपसंद घाट पे, जहां
हम-तुम नदी में पांव डाले,
घंटों बीताया करते थे |
अब, जब कि तुम नहीं हो मेरे साथ
तुम्हारी यादों के साथ ही, बैठा करते हैं |
फिर भी तुम्हारी यादें ज़िद करने लगती हैं,
उनके साथ कुछ और ठहरने के लिए,
ऐसे ही समय बढ़ता जा रहा है,
तुम्हारी यादों के साथ |

और कभी-कभी तो तुम्हारी यादें,
आने ही नहीं देतीं वहां से,
ज़बरदस्ती मेरे दिल का हाथ पकड़,
बिठा लेती हैं, अपने पास |
और सहर, हम दोनों के माथे पर
बोसा दे, ये कहती है “अब लौट जाओ” |

सुनो ना!
क्या तुम अपनी यादों को,
समझा नहीं सकती ?
कि यूं,‌ मेरे पास ना आया करें!
छोड़ो, रहने दो… एक तुम्हारे बाद,
यही तो सबसे क़रीब हैं मेरे.. जो,
मेरे रोम-रोम से वाकिफ़ हैं….
अगर, इन्होंने भी मेरा साथ छोड़ा
तो, वही दशा हो जाएगी मेरी जब,
तुम छोड़ गयी थी… एक यही तो हैं
जो मुझे, मुझसे बेहतर जानती हैं,
जो संभाले रहती हैं मुझे |

एक बात और बतानी है तुम्हें…
तुम, मेरी ज़्यादा फ़िक्र ना किया करो,
मैं ठीक हूं… क्या हुआ गर हम,
इस जन्म में ना मिले ? अगले जन्म में
फिर मिलेंगे, बिछड़ने के लिए…
या फिर, कभी ना बिछड़ने के लिए ||

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

तु ही बता, हम क्या लिखें !

हम तेरी आंखों को क्या लिखें!
तेरी यादों को क्या लिखें !
तेरे ख्वाबों को क्या लिखें !
क्या लिख दें! अपने दिल के जज़्बात,जो तेरे लिए है ।
क्या ये भी लिख दें! कि ये दिल
अब तेरे लिए ही धड़कता है ।
क्या ये भी लिखे, कि इन आंखों को
अब तू ही हर जगह दिखाई देती है ।
इन कानों को तेरी ही बातें सुनाई देती है ।
ये जो शरीर है, मेरा होते हुए भी
अब मेरा नहीं है – इसको क्या लिखें !
तेरी मुस्कुराती शक्ल,
मुझे सारी दुनियां भुला देती है ।
क्या ये भी लिखुं कि तेरी
आंखों की चमक से पीछे है,
सूरज की चमक ।
या इन आंखों में,
दुनियां भर की गूज़ारिशें लिखें ।
तू ही बता!
हम तेरी आंखों को क्या लिखें ।
तेरी यादों को क्या लिखें ।
तेरे ख्वाबों को क्या लिखें ।

©काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

एक ऐसा घर हो

जो मेरी सारी दुनियां हो,

उसकी बात हो,

उसके सपने हो,

उसकी याद हो,

मुलाकात हो…

जिसमें मेरी तनहाई हो,

मेरी ख़्वाहिशें हों,

मेरी ख़ामोशी हो,

मेरे ख़्वाब हो….

“एक ऐसा घर हो”

तिरे इश्क़-सा होता क्यों नहीं

इश्क़ में,  तिरे इश्क़  सा  होता  क्यों नहीं ?
ज़िंदा  नहीं  हूं  मैं , तो  मरता  क्यों  नहीं ?

बंट  गये   हैं अब तो हम मजहबों  में, नासूर
नहीं  है  ये दिलों  के, तो भरता  क्यों   नहीं ?

वो जो मुब्तिला है दरवेश तिरे शहर में, कोई
उसका इंतजामे – रिज़्क , करता क्यों नहीं ?

ज़रूर वो  मुसाफ़िर  होगा – गांव  का  मकीं
भटकता  है  दरे–शहर,  ठहरता  क्यों  ‌नहीं ?

वो मर्जुम है करिबे मर ऐ “काफ़िर”, ओ’
क़ानून है अगर , तो  कोई  डरता  क्यों नहीं ?

           © काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

१- मुब्तिला– दुख में पड़ा हुआ
२- दरवेश– फ़कीर, मंगन
३- रिज़्क– अन्न/जीविका
४- मकीं– घर/मकान में रहने वाला
५- मर्जुम– जिसे पत्थर से मारा जाए
६- करीबे-मर– मरने के करीब

बहन की कहानी

आओ  तुमको  मैं  इक किस्सा  सुनाऊं ,
चलते  फिरते  मैं  इक परी  से  मिलाऊं ||

समझदार, नटखट भी, है थोडी चंचल भी
ऐसी बहन को पाके मैं क्यों ना इतराऊं ||

कभी  उदास   हो  जाऊं  हद  से  ज़्यादा,
फोन घुमाऊं और उसी से दुखड़ा सुनाऊं ||

कभी झगड़े कभी डांटे कभी बड़ों सा समझाए
ऐसी  बहन  पे  मैं क्यों  ना  वारी  वारी  जाऊं ||

जब भी जन्म मिले “काफ़िर” को धरती पर,
बहन  ही  मै   तुझको  हर जन्म  में  पाऊं  ||

© काफ़िर ग़ाज़ीपुरी

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